पहली तारीख

By: jitendra shivhare

एक कहानी रोज़-57

*पहली तारीख*

       *आज* का दिन बाकी दिनों से अलग था। परिवार में सभी खुश थे। सभी सदस्यों की इच्छाएं जो पुरी होने जा रही थी। रसोई घर में रमन की मनपसंद सब्जी बना रही पत्नी नदंनी बार-बार घड़ी देख रही थी। कितने समय बाद उसके गहने सुनार के यहां से घर वापिस आने वाले थे। आर्थिक तंगहाली में सुनार के पास गिरवी रखे जेवरों के लिए इस बार नदंनी अड़ गयी थी। उसे वे जेवर इस महिने हर कीमत पर चाहिए थे। रमन स्वयं भी मना करते-करते थक गये थे। सो इस माह की सैलेरी में से सुनार का अब तक का ब्याज जमा कर गृहलक्ष्मी के गहने घर लाने का वचन रमन अपनी पत्नी को दे चूके थे। दोनों काॅलेज अध्ययनरत बच्चें अंशिका और अंश भी दरवाजे पर टक-टकी लगाये अपने पिता की प्रतिक्षा कर रहे थे। रमन बेटी अंशिका को हर माह अपनी तनख्वाह में से कुछ राशी देते थे। यह राशी अंशिका अपने लेपटाॅप कम्प्यूटर के लिए जमा कर रही थी। यदि आज रमन उसे आखिर किश्त दे तो लेपटाॅप क्रय करने की समुचित राशी का प्रबंध हो जायेगा। अंश इस अभिलाषा में था कि आज उसके पिता काॅलेज की वार्षिक परिक्षा शुल्क की व्यवस्था कर देंगे। ताकी वह निर्भिक होकर परिक्षा में बैठ सकेगा। बुढ़े माता-पिता हमेशा की आज भी निश्चिंत थे। परिवार के जरूरी सदस्यों की मांग पुरी हो जाये तब जाकर उनका नम्बर आयेगा, वर्ना नहीं।
रमन द्वार पर आ चुका था। उसे देखते ही सभी की आंखों में चमक आ गयी। रमन भी उन सभी की मंशाओं  पर खरा उतरा। वह अपने चश्मे को रूमाल से पोंछकर कुछ खड़ी सुस्ता रहा था। पार्वती गिलास में पानी ले आयी। क्योंकि उसकी बहू नंदनी अपने गहने देखने में व्यस्त थी। और बच्चें लेपटाॅप की राशी गिनने में व्यस्त हो गये थे। सम्मुख खड़ी अपनी मां को देखकर रमन कुछ चिंतित हो गये। सबके लिए बर महिने कुछ न कुछ अवश्य आता था। किन्तु मां-बाप के इच्छुक होते हुये भी रमन अपनी प्राथमिकताओं में दोनों की इच्छाएं सम्मिलित नहीं कर पाया। अपनी मां के हाथों से पानी का गिलास रमन ने ले लिया। 
"अरे पिताजी! ये आप क्या रहे है? मैं अपने जुते निकाल लुंगा। मुझे पाप का भागी मत बनाईये।" रमन अपने पिता  गंगाराम से बोला।
गंगाराम अपने बेटे रमन के पैरों से जुते निकाल रहे थे।
"करने दे बेटा। तु सबके लिए इतना कुछ करता है! हमारी भी जिम्मेदार है कि कुछ तेरे लिए भी करे।" पार्वती बोली। वह अपने आँचल से रमन का पसीने से सना माथा पोंछ रही थी।
"पिताजी! मूझे माफ़ कर दीजिए। आपका चश्मा इस महिने भी बन नहीं पायेगा।" रमन ने अपनी विवशता बताई।
"कोई बात नहीं बेटा। तु मेरे चश्मे की चिंता मत कर।" गंगाराम बोले।
"और मां! आपकी तीर्थ यात्रा! लगता है इस महिने भी नहीं हो पायेगी।" रमन बोला। उसकी आंखे भीग चूकी थी।
"अरे! तु हमारी चिंता छोड़! अपनी चिंता कर। देख तेरे जुते कितने खराब हो चूके है।" पार्वती बोली।
"नहीं मां! अभी तो ये कुछ महिने और चलेंगे!" रमन बोला।
"नहीं बेटा। तुझे डायबीटीस है। पैरों की सुरक्षा आवश्यक है। देख तेरे पिताजी तेरे लिए क्या लेकर आये है?" पार्वती बोली।
रमन आश्चर्य से गंगाराम की ओर देख रहा था। गहने तिजोरी में सही सलामत रखकर ही नदंनी को चैन आया। वह बेडरूम से निकलकर बाहर आ गयी। अंशिका प्रसन्नचित होकर लेपटाॅप का ऑनलाईन ऑर्डर दे चूकी थी। अंश के पास परीक्षा फीस के रूपये आ चूके थे। जिन्हें कल ही वह काॅलेज में जमा करने जाने वाला था।
गंगाराम ने हाथों का पैकेट रमन की ओर सरका दिया। रमन के साथ परिवार के सभी सदस्य देखना चाहते