ये तन्हाई कुछ कहती है

By: Ekant Negi

उसकी गली से होकर गुजरना !!

   अनुरागी मन को रास आता नहीं

      ढूँढता है अब कोई नया ठिकाना !!!

 

मन की वीणा के बिखरे तारों से !!

   सांसें अनायास मचलने लगी हैं

      किस बावरे ने छेड़ा है ये तराना !!

 

 

वो रिमझिम सावन का महीना !

   झूले में खुलती गाँव की गोरियाँ

      याद आता है वह गुजरा ज़माना !!!

 

पतझड़ में सूखे पत्ते गिरने लगे !

   मनचली बसंत के इंतज़ार में

      ये बात कोई उनको बतलाना !!!

 

मेरे इस खत को कभी पढ़ लेना !

   तेरी तृन्हाईयों के कोरे पन्नों पर

      लिखती हूँ दिल का अफ़साना !!!