ठहराव.......

By: Babita Mishra

ठहराव.......
निरतंर  चलती  रही ज़िन्दगी
         अब ठहराव चाहिए
तड़पते एहसासों को 
           अब प्यार की छाँव चाहिए
चल पड़े  अनजाने सफर की ओर
          अब  मंज़िल  चाहिए
खोया भी बहुत कुछ नाम की चाह में 
         अब  नाम नहीं अपनो का साथ चाहिये 
       
क्यू दूँ ज़िन्दगी में ईम्तहान मैं बार बार 
         अब ईम्तहान का अंत चाहिए
उलझानो से भरी जीवन की नाव को 
         अब पतवार चाहिए
     
ख़ुशियों और ग़म का सार है ज़िन्दगी
क्या हुआ अगर नम है आँखे 
        अधरो पर मुस्कान चाहिए 
जीत जाएँगे दुनिया की हर जंग 
       बस तुम्हारा साथ चाहिए .....

            बबीता मिश्रा