नहीं बनूंगी

By: Shampa Saha


 

कैसा तुम्हारा  झूठपे झूठ 
कैसा तुम्हारा इये गुस्सा 
 नहीँ  बनना मुझे घरकी लछमी
 बंद करो अव इये किस्सा
लौ  वनके नहीं जलूंगि
लहरों बनके ना बिखरूंगि
बनना है तो आग बनुंगि
और  जलाउंगि सवके गूरुर
 लड़के हौ, तो सब पे छूट्
लड़की हौ तो है पिंजरा 
छोड़ो वो सव कल्  कि बाते 
वो दिन  अब है गूजरा
बनना है  आकाश बनुंगि
जिसके प्रसार की ना सीमा 
अब मेरी लाज मेरे हाथों में 
अब मैं खुद अपनी जीम्मा
 नहीं बनुंगि घर की आंगन
बनना है तूफां ही बनु
 घर और युद्ध में  चुनना हो 
मैं  युद्ध का मैदान हि चुनूं.