शहर

By: YASHVIR KAPIL

शहर

ये कैसा शहर है,

हर चीज़ यहाँ अजीब है।

अकड़ी हुई गर्दनें नज़र आती हैं।

चारों तरफ परछाइयाँ नज़र आती हैं।

सब नौकरी करते हैं,

महोब्बत कोई नहीं करता,

क्यूंकि महोब्बत करने की

तनख्वा नहीं मिलती।

यहाँ लोहे के पेड़ उगे हैं,

जिनपर बिना पंखों वाले परिंदे बैठे हैं।

यहां परिंदों के पर

बचपन में ही कतर दिये जाते हैं।

फिर उन परों को दवात में

डुबो कर कहानियाँ लिखी जाती हैं।

ये रेगिस्तानों का शहर लगता है।

हर आंख में रेत है,

हर लब पे प्यास है,

हर चेहरे पर गर्द है,

हर दिल में दर्द है।