वाक़िफ

By: मयंक सेंगर

मुस्कुराते चेहरों पर काबिज़
उलझनों की जो गर्दिश है
हटा सकते हो अगर उसको
तो हालात से वाक़िफ हो तुम 

तालियों के शोर में अनसुनी  
मायूसियों की जो सिसकी है
सुन सकते हो अगर उसको
तो हालात से वाक़िफ हो तुम

रिश्तों की गर्मजोशी में शामिल
तल्खियों की जो साजिश है
सुलझा सकते हो अगर उसको
तो हालात से वाक़िफ हो तुम 

खैरियत की दुआ में सुलगती
रंजिशों की जो आतिश है 
बुझा सकते हो जो उसको 
तो हालात से वाक़िफ हो तुम

खयालों के तिलिस्म में उलझी
अनकही दबी सी जो हसरत है
जता सकते हो जो उसको