कब तक मानवता के धर्म को तौलेगा

By: मदन मोहन

कब तक मानवता के धैर्य को तौलेगा।
सिंहासन अब कुछ ना कुछ तो बोलेगा।
आज हुआ जो अभिमान छीन्न-भीन्न।
शायद तो क्रुद्ध हो राजनीति क्या डोलेगा।
अब कब तक भृगु का नयन कुपित होगा।

किवदन्ती है या भृगु कुपित नयन को खोलेगा।।

आज हुआ जो मन स्वीकार करूं तो कैसे।

हृदय की प्रीङा का अब भार धरूं तो कैसे।
जो हुआ अकल्पीत था,आङ करूं तो कैसे।
इस अपमानीत प्याला से श्रृंगार करूं तो कैसे।
अब तक था छाया धूंध,कब सुर्य उदित होगा।
वेदना अशह सी है,कब भृगु कुपित नयन को खोलेगा।।

अब क्या उपमानो के अलंकार का मतलब होगा।