जिंदगी एक इम्तिहान है

By: Babita mishra

 नैना बेटा जल्दी करो लड़की वाले आते होंगे और तुम यूं ही बैठी हो उदास होकर”!

“ मां आपको पता है ना मुझे शादी नहीं करनी फिर भी क्यों आप जिद कर रही हैं”.....  आप अपनी कहानी भूल गई हैं ,जो मुझे इस नर्क में धकेलना चाहती हैं”

मेरे समझाने पर नैना नैना शादी के लिए तैयार तो हो गई थी लेकिन मेरे जख्म को ,जो  नासूर बनकर मुझे हर दिन झंझोरते  रहते थे  आज फिर से हरे हो गए थे नैना की बातों से! 

20 साल की थी कि मेरी शादी नीरज  से हो गई। अपने घर में भी सबकी लाडली थी ,और ससुराल में भी लाडली क्योंकि नीरज अपने मां-बाप के इकलौते संतान थे। 

बड़े अरमानों  के साथ मेरे साथ ससुर ने  बेटे की शादी कर मुझे  लाए थे। नीरज मुझसे बहुत प्यार करते थे मेरे हर बात  बहुत  का ख्याल रखते थे, लेकिन इकलौती संतान होने के कारण बहुत जिद्दी थे!

एक  साल के  बाद पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं और देखते ही देखते 9 महीने के बाद  नैना हमारी जिंदगी में आ गई।  जिंदगी  सपने जैसे चल रही थी !

मेरे भाई की शादी थी।  मैं , नैना और  नीरज के साथ कुछ दिनों के लिए  अपने मायके आई थी , शादी समारोह खत्म हो गया तो  सब अपने अपने  घर चले गए…  नीरज  मुझसे बोले घर चलने को तो,

 मेरी मां बोली “ बेटा इसे कुछ दिन रहने दो, एक ही जगह मायका ससुराल होने के कारण कभी इसे मेरे पास रहने का मौका ही नहीं मिलता”.... !

  दो  दिनों  के बाद नीरज वापस आए हमें वापस ले जाने को, उस दिन घर में पूजा था वह मुझसे बोले  चलने को।  मैं बोली आज पूजा है आज रुक जाते है  कल चलेंगे। … 

 नीरज  गुस्सा कर बोले  “ठीक है यदि तुम्हें मुझसे ज्यादा  मायका पसंद है तो यहीं रहो हमेशा के लिए ,मैं कभी नहीं आऊंगा तुम्हें लेने”.... 

 मैंने कितना मनाया पर मेरी एक बात भी नहीं सुनी ,और वो   गुस्से में चले गए और ऐसे गए ,कि आज-तक नहीं लौटे।

 उनके जाते ही लगा, कि वह अपने साथ लेते  मेरी किस्मत भी लेते गए  मैं और मेरी  बेटी  हर दिन इसी आस  पर जीते रहे कि शायद आज हमारा इंतजार खत्म हो जाएगा। …

 इंतजार का एक पल भी काटना मुश्किल होता है और   हमारा इंतजार तो ऐसा था जिसकी ना तो कोई आधार था  और ना कोई समय सीमा। …. हर आहट पर लगता , कि शायद वह आ गए पर हर बार मेरी नजर निराश होकर लौट आती  और  मैं  उसी इंतजार की अग्नि में बार बार तपती  रही….  न पुलिस न रिश्तेदार, कोई भी  नहीं ढूंढ पाया। 

 

समाज और सास ससुर के लिए मैं गुनहगार बनकर रह गई   बिना किसी गलती के।  सारे दरवाजे बंद हो गए थे मेरे लिए। 

सास ससुर की चुभती आंखें  हर बार मुझे तोड़ती , समाज के प्रश्न मुझे हर बार नीचा  और शर्मिंदा करने में कोई कोताही  ना  करते। 

 बहु कहाँ  हो..? “ लड़कीवाले आ गए” , सास की आवाज  से मीरा की तन्द्रा टूटी। हाँ। .! माँ आ रही हूँ बस… कहते हुए  , शीशे के सामने साड़ी ठीक कर , माथे पर बिंदी चिपका कर सिन्दूर की डिब्बी उठाकर मांग भरते हुए मन ही मन खुद से ही प्रश्न कर रही थी किसके लिए.. सुहागन  बड़े शान से गर्व से अपने मांग को भरती  है लेकिन मुझे तो ये भी नहीं पता की मैं सुहागिन हूँ  या विधवा !!!

 

 क्यों लगाती हूँ मैं, किसके लिए, जो  चला गया मुझे छोड़ के, बिन मुझे  बताये कि “ आखिर कसूर क्या था मेरा” जो अपना वादा भी  न निभा सका। …