पागल चूहे, काली मिरच और सुअरगर्द शहंशाह

By: अबीर आनंद

पूस की वह रात कड़ाके की ठंड में झुलस रही थी। हिमालय की तलहटी से उतर कर ठंडी बयारों के झोंके, सांय-सांय करती हुयी बर्फीली आहों से मौसम को असह्य बना रहे थे। ठंडी हवा के अतिक्रमण से बचने के लिए घरों के दरवाजे अच्छी तरह बंद कर दिए गए थे। सूत की रजाईयों में लिपटे बदन, अपनी ही गर्मी को सहेजने का असफल प्रयास कर रहे थे। रक्त जैसे धमनियों में जमा जाता था। नींद की टोह में मैली-कुचैली कथरियों पर पड़े दोहरे बदन करवटों के भ्रमजाल में व्यस्त थे। रजाई के नर्म आगोश में जितनी दुर्गन्धपूर्ण हवा भरी थी, बस वही साँसें सींचने के काम आ रही थी। उसे उघाड़ कर एक तरफ करके साँस लेने की हिम्मत तक नहीं बची थी। 

ऐसी हाड़ कँपा देने वाली ठंड में, व्याकुल चूहों का एक झुण्ड तीव्र गति से एक दिशाहीन मंजिल की ओर दौड़ रहा था। झुण्ड का नेतृत्व किसी के हाथ न था। न कोई सेनापति था और न कोई सिपहसालार । बस एक बेतरतीब भटकी हुयी भीड़ थी जो मदहोश शराबी की तरह कभी इस राह मुड़ती तो कभी उस राह। बर्फीली ठंड  में भी उस झुण्ड की गति बेधड़क और निडर थी। ठंड  का प्रकोप भी उन पागल चूहों के वेग को नियंत्रित करने में बेअसर प्रतीत होता था। उनकी तेज़ और नुकीली चरचराहट कभी-कभी बयार की सांय-सांय को भी निस्तब्ध कर देती।

 

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