कटिकुन्तला

By: Kahaf Rahmani

अरी ओ री,

हृ-पृष्ठों उत्तलताल !

हृ का व्यापक मूल्य ?

स्पर्श से शयित रमणी का आलोड़न।।

मंथन उर-उरु का , सुशोभन उर से।

 

नारी सूक्ष्म शक्तियों का प्राबल्य

आकृतियों पर नवीन आकृति , स्पष्ट उभार।

अंगभंगिमा प्रकांतित

विभक्त प्रकोष्ठों

स्पर्श , माध्यम उस परिधि का

व्यास सघन , तरंगित 'त्व' पर

आवृत्त मन:वीथिका।

 

सुसूक्त_ निर्विरोध शान्ति का,

रक्ताधिक्य प्रकान्ति ;

समाविष्ट केलि पर की उद्भ्रांतियों का।

(कहफ़ रहमानी)