आम इंसान

By: Shivam Mishra

 चमकती हुई दुनिया में, कुछ खुरदुरा सा हुँ
पसंद-नापसंद से बहुत दूर, बस जरूरतों सा हुँ
न इंतजार है, न ही जल्दी है, शायद ठहरा सा हुँ
न दिखता हुँ, न ही समझ आता हुँ, वक़्त के पहरे सा हुँ
ख़्वाब भी नहीं, नींद भी नहीं, महज़ सुकून सा हुँ
दौलत बेगानी है, शौहरत भी बेगानी है, ईमान सा हुँ
न अच्छा कहते हैं, न बुरा,शायद शमशान सा हुँ
कुछ सब्र है, कुछ मज़बूरी भी, इसलिये लूट रही दुकान सा हुँ
तुम सोच रहे होगे,मिसरों में मसला क्या छुपा है..?
ऐ दोस्त!बात मामूली है, मैं आम इंसान सा हुँ