मेरा गाँव

By: Shyam Pandey

मेरे गांव का वो मासूम अंधेरा लौटा दो मुझे,
तेरे शहर के ये उजाले अब डराने लगे हैं;
धूल जमी थी चेहरे पे मगर, दिल साफ हुआ करते थे,
यहां तो अब अपने ही अपनो को गिराने लगे हैं;
माँ की वो लोरियां की जिन्हें सुनकर सोते थे कभी,
इन चमकते शहर की डरावनी रातें अब सुलाने लगी है;
वो टूटी पगडंडी की जिसपे बाबा संग चलते थे कभी,
ये लंबी वीरान सड़कें अब बिन दौड़ दौड़ाने लगी है;
वो पंचायतें की जहाँ सब बराबर हुआ करते थे 'राही',
यहां तो अमीर कानून को कोठियों पर नचाने लगे हैं।