Baazaar ki sair

By: ANJAAN PULKIT

यहाँ सुबह होती है और शाम,

सामान मिलता है बहुत आम।

दोपहर दोपहर जैसी लगती नही,

बोलते सुना, "इसका दाम लगा दो, सही!"

 

पहली बार इन पतली गलियारों में पैर रखा,

उमड़ती भीड़ में जगह बनाई।

हाथ को मैंने सामान से भर रखा,

एक खोपचे मे पानी पूरी तो दूसरे में भेल खाई।

 

चलने की भी जगह नही थी,

और रास्ता मैं भूल गया|

आखिर में खिलोने की दुकान थी,

शुक्र है हमे रास्ता मिल गया।