घर घर नहीं रहे

By: Surinder kaur

घर घर नहीं रहे, मकान हो गये हैं। 
माँ बाप उस का, सामान हो गये हैं। 

एक साथ बैठे, निवाले दो  खा ले
टुकड़े टुकड़े, खानदान हो गये है। 

कैरियर की तलाश, भुला दे माँ बाप
बेटा बेटी अब तो मेहमान हो गये है। 

नहीं लौट के आते बच्चे जब उड जये
माँ बाप मुफ्त में दरबान हो गये हैं। 

अजब दुनिया के, अजब है फसाने
हम तो बस टूटा अरमान हो गये हैं। 
सुरिंदर कौर