Nav varsh ki sugbugahat

By: Nandita

साल की सुबह हो जाये ,
दरवाजे पर दस्तक देती,
सर्द रात एक हवा हो जाये,

बीते साल के रक्तिं सवालों में,
 कुटीली मुस्कुराहटों में,
बूढ़े सयाने बच्चे हो जाए,
अखबारों में भरी मासूम किलकारी हो जाये।

ठिठकी सी ठिठुरन में,
 नाचते इंसानी मुखौटो में,
झुलसे हुए रिश्तो की खालों में,
 आग की लपटों में,
गिद्धों के भोजनालय में,
 इंसानियत की ढहती दीवारों में,
 ईट ईट गिरकर बुनियाद भर जाए।
दहशत के लम्हे समेटे नया साल,
 खुशियों का पैगाम लाए
 आहट पर कान धरे बैठ जाऊं,
उजाले में लिखूं जिंदगी का मरसिया,
कल और आज मेें अन्तर हो जाये