नहीं मिलता....

By: Santosh Kumar

पहचानता था मैं जिसको 
वो शख्स नहीं मिलता 
किसी और सा बनने की चाहत में 
खुद का अक्स नहीं मिलता 

 मुट्ठी भरी थी सपनो से 
वो हाथों से फिसल गयी 
जाने कब ये दुनिया की 
हक़ीक़त में जाकर मिल गयी 
दुनिया की भीड़ में

ख्वाब नहीं मिलता

बहुत ढूँढा बहुत पुकारा 

कोई जवाब नहीं  मिलता 

 वजूद क्या है सवाल है ये 
है हकीकत या ख्याल है ये 
पहचान आईना या कुुआँ कोई
मुक्ति है मेरी या जंजाल है ये 
पग पग यहाँ  गड़े है पत्थर 
राह का पत्थर नहीं मिलता
 मुझको अपने जीने-मरने में 
अब कोई अंतर नहीं मिलता