मैं ही राही, मेरे अनजाने सफर का

By: Himanshu gautam

मैं ही राही, मेरे अनजाने सफर का,

थोड़ा समझदार, थोड़ा बेखबर सा,

मैं हर मोड़ पर, आराम नहीं करता,

हर मुश्किल से, जबरन नहीं लड़ता,

 

मैं ज़िद में आकर लापरवाही करता नहीं,

लेकिन गलतियां करने से भी डरता नहीं,

ज़िन्दगी जीने के मेरे मायने भी अलग हैं,

क्या है ना कि, हमारे आइने भी अलग हैं,

 

मैं हार कर भी, कभी खुद से नज़रें नहीं चुराता,

अपनी गलतियों को, कभी खुद से नहीं छुपाता,

ना किसी मंज़िल का हुआ मैं, ना रहा मैं किसी शहर का,

मैं बेखबर राही जो ठहरा, अपने अनजाने से सफ़र का।

--himanshu guatam