.........डरने लगी हैं।

By: Shravani Prakash Lingade

चाहते है कुछ दिनोंसे कुछ कहना तुम्हे
पर जबान लब्जोंसे डरने लगी है|
चाहते है कुछ दिनोंसे मिलना तुम्हे
पर पाव जमी से डरने लगे है|

ख्वाइश बस सपनो में पाने की थी तुम्हे
पर आज तो सपने भी निंद से डरने लगे है
लिखना तो बहुत चाहती हुँ हर पन्नें पर
पर भरी कलम कागज से डरने लगी है |

चाहते तो आपकी आखों में डुब कर बात करना 
पर मेरी आखें आपके नजरियेंसे डरने लगी हे |
हाथ थामकर हाथ में तुम्हारे नसीब लिखना चाहते है
पर नसीब की डोर हाथों की लकिरोंसे ही डरने लगी है।।२