आख़री जंग

By: Nirmal Chand Malooka

रात की रागिनीयो का सुरूर कुछ ऐसा है,

तपती गर्मी के बाद सुहाने सावन जैसा है...

 

नाम कि जड़ोजेहद में इंसान सो सा गया है,

आगे बढ़ने कि राह में वजूद मेरा खो सा गया है...

 

ना आपसे, ना उनसे, ना किसी और से,

ये लड़ाई मेरी खुद से है...

एक आख़री जंग मेरी मेरे वजूद से है l