हम दिहाड़ी मजदूर कहाते

By: SHASHI KANT SINGH

कर श्रम घर का बोझ उठाते
हैं जब रोज कमाते तब खाते
बेबस लाचारी में ही जीवन गवांते
ना खुद पढ़े खूब ना बच्चे पढ़ा पाते
ना सपने आंखों पर अपने सज पाते
बन आंसू पलकों से वो गिर जाते
लक्ष्मी सरस्वती भी हमसे नजर चुराते
मना मंदिरों से उन्हें ना घर ला पाते
हम दिहाड़ी मजदूर कहाते

सींच मिट्टी नई कलियां उगाते
अन्न फल फूल उपवन में सजाते
हर निर्माण की भार उठाते
सड़क पुल बांध और नहर बनाते
बन पहिया विकास की गति बढ़ाते
हम जो रुकते तो देश भी थम जाते
हम दिहाड़ी मजदूर कहाते ।