रे पिंजरे के पंछी

By: Ekant Negi

साँसों में घुटन

बदन में चुभन

बंद आँखों से टपकता तीखा पानी

फ़िज़ा में सिहरन

रोये जैसे विरहन

डाल पर क्यों फीकी है चुनर धानी

दुखों का जमघट

जिंदगी हुयी मरघट

दीवारें भी करे बयाँ अपनी परेशानी

नए सपने तलाश

खुद को भी तराश

इन तन्हाईयों में कर कुछ मनमानी

सहमा-सहमा शहर

सिसकता हर पहर

हर पल आंधी हर रात यहाँ तूफानी

भूल जा वह मैखाना

घर हुआ कैदखाना

रोशनदान से झांकती मायूस जवानी

पिंजरे में हुआ कैद

जहाँ नहीं कोई वैद्य

रे पंछी भूल जा वह अम्बर असमानी