काल की क्रूर परछाईयाँ

By: Ekant Negi

न तू जान पाया 
न मैं जान पायी 
तेरे मेरे बीच क्यों हैं ये दूरियाँ 
कुछ सितम तूने किये 
कुछ सितम मैंने किये 
वरना होती न ये मजबूरियाँ 
कोई सिसकता उधर 
कोई सिसकता इधर 
सिसकती सूनी ये तन्हाईयाँ 
इन बेचैन हवाओं में 
बार-बार मंडराती हैं 
मौत की गुमनाम परछाईयाँ
साँसों में अजीब घुटन 
आँखों में तीखी चुभन 
बस रहेंगी हमारी कहानियाँ 
हमने ही जहर घोला 
कुदरत के आँगन मैं
हमने ही जन्मी ये परेशानियाँ
न तू पास मेरे 
न मैं पास तेरे 
मौन हैं वक्त की शहनाईयाँ 
कुदरत के पैगाम को 
क्यों हम समझे नहीं 
काल बनी अपनी शैतानियाँ