मन के दरवाजे |

By: Kaveri Nandan Chandra

कल मेरी फ्रेंड ने मुझे याद दिलाया की यह तीसरा लॉक डाउन हैयकीं मानिये पहले लॉक डाउन मैं मैंने भी एक एक दिन गिन के काटा लेकिन फिर क्या हुआ मुझे नहीं पता, या यूँ कहूं पता है लेकिन शब्दों मैं कैसे उतारूं उन्हें ये नहीं पता | मेरा नाम तन्वी है, पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, एक कंप्यूटर जैसी ज़िन्दगी चल रही थी, सुबह जबरन उठो, तैयार हो, जो सामने मिले सो खा लो, जितना जल्दी हो सके दफ्तर पहुँचो, दिन भर ऐसे काम करो की सर ऊपर करने की भी फुर्सत मिले, वापसी मैं कई घंटो तक ट्रैफिक मैं फॅसे रहो, अधमरी हालत मैं देर रात घर पहुँचोये है आम ज़िन्दगी, चलिए अब बात करते हैं मेन्टोस ज़िन्दगी की, हाहा | २४ मार्च की बात है, ऑफिस से वापस रही थी, ऑटो मैं थी तब माँ का कॉल आया, मैंने कॉल पिक किया तो वो बोलीं कहाँ हो बेटा? मैंने कहा कमरे पे जा रही हूँ | दरअसल मैं इलाहाबाद की रहने वालीं हूँ, नौकरी के सिलसिले मैं लखनऊ मैं बतौर पेइंग गेस्ट रहती हूँ | माँ ने हड़बड़ाते हुए कहा, कोरोना बहुत ज्यादा फ़ैल चूका है, अभी मोदी जी लाइव आये थे, २१ दिन का लॉक डाउन कर दिया है | मैंने बोलै 'क्या २१ दिन का? ऑफिस बंद हो जायेगा तो मैं यहाँ क्या करुँगी? माँ ने बोला 'आने की कोशिश करो बेटा, अकेले क्या करोगी?' उनके ये कहते ही फ़ोन की बैटरी ख़तम हो गयी, फ़ोन बंद हो गया | ऑटो वाले भैया बोल पड़े 'मैडम जहाँ हैं वहीँ रहिये, शहर छोड़ना सुरक्षित नहीं रहेगा, बस २१ दिन की ही तो बात है'| मुझे पता था मुझे नहीं अपने आप को संभल रहे थे, मेरा मन सच मैं बिलकुल विचलित हो गया, मेरा सिस्टम जो हैंग हो गया था, सुबह से शाम तक मशीन की तरह काम करते करते, अचानक से सब थप | मैं रात भर सो नहीं सकी, सच बताऊँ कोरोना के बारे मैं तो कोई ख्याल ही नहीं था जेहन मैं, फ़िक्र सिर्फ इस बात की थी की, कल सुबह से करुँगी क्या ? एक रात ने इतना कुछ सीखा दिया था, सिर्फ एक जहाँ टिक कर बैठना कितना मुश्किल काम है, बाप रे | तभी मेरी नज़र एक मुरझाते सूखे पौधे पर पड़ी जो खिड़की पे रखा था, 'अरे ये तो बिलकुल सूख गया, कब से पानी नहीं दिया मैंने' मुझे तो याद ही नहीं था | उसका वो सूखापन मुझे मेरे गले मैं महसूस हो रहा था | मैंने उससे गौर से देखा कुछ देर के लिए, पेड़ जो ऑक्सीजन छोड़ते हैं हम उससे ग्रहण करते हैं, हम जो कार्बन डाइआक्साइड छोड़ते हैं ये वो ग्रहण करते है | पांचवी के बच्चे को भी ये पता होता है, और मैं मुर्ख अपने आप को अकेला समझ रहीं हूँ | सोच रही हूँ की मेरा ख्याल कौन रखेगा ? इससे भी ज्यादा किसी चीज़ की ज़रुरत है क्या ? बस उस रात देखते ही देखते कुछ बदल गया था मेरे अंदर, यकीं मानिये मैं घंटों अपनी खिड़की पे अपने छोटे से प्यारे से पौधे के साथ वक़्त बिताती हूँ, कहीं होने या जाने की जल्दी नहीं है, सब कुछ यहीं हैं, ठीक मेरे अंदर बस कमी है तो शायद ठहर जाने की, समझ जाने की, उस प्यार को महसूस करने कीआज मुझे ये याद भी नहीं है की लॉक डाउन का कौनसा दिन चल रहा है या कितने दिन गुज़र चुके हैं | बहुत सुकून और सुख के साथ कह सकती हु की लॉक डाउन मैं भले ही मेरे घर के दरवाजे बंद हो गए लेकिन मेरे मन के दरवाज़े खुल गए हैं |