Dahez

By: Shikha Mishra

उम्र के उस कगार पर हूँ। 
जहाँ खड़ी एक बाजार में हूँ। 
बिकता नहीं हैं। यहाँ कोई खिलोना।
भीर भी दाम हैं। जैसे सोना। 
रिश्तों की होती हैं मानो  जैसे कोई सौदेबाजी। 
जहाँ हर एक रिश्ते खरीद कर भी बिक जाता है। एक बाप 
जहाँ सब कुछ बेचने के बाद भी गुरूर दिखाता है। दुसरा बाप।
रिश्तों की ये सौदेबाजी ना जाने कब से जारी है। 
पर देख जाना मुझे नही करनी ।तुम से ऐसी वाली यारी हैं। 
पिता का गुरूर कहलाती हैं। ये बेटियां 
तु गुरूर भी ले जा रहा है। ओर जी हुजूरी भी करवा रहा है। 
चल माना रीत यहीं बताती हैं। 
बिटियाँ परायाँ धन ही कहलाती हैं। 
कर भी दे पिता गुरूर का दान। 
भीर भी तु वादा कर ना महफ़ूज रहेंगी। उसकी संतान। 
तुझे मे दहेज़ का कीड़ा कुछ इस कद्र समाया हैं। 
इन्सान होकर भी तुने इन्सान को जलाया हैं। 
तु सोच ज़रा हजारों की तनख्वाह में लाखों की शादी उसने रचवाई हैं ।
तुने तों उस पिता की नींद भी चुराई ।
बेटी तों तुम ने भी  बिहाई होंगी 
भीर कैसे नही तुम्हें एक बेटी के पिता की दर्द समझ में आई। 
चल माना नहीं बिहाई तुम ने ख़ुद की बेटी। 
पर कभी ना कभी तो तुम्हें भी रूलाई ही होंगी किसी बेटी की विदाई। 
चलो ना बंद करतें हैं। ये रिश्तों की  सौदेबाजी। 
जरुरत ही क्या हैं  ये दिखावे की ड्रामेबाजी