ख़ामोशियाँ.......

By: Babita Mishra

ख़ामोशियाँ.......

यादो  के पलछिन में  डूबती  उतरती
बैठी   वो  ख़ामोश खोयी गुमसुम सी 
भरें  नयनो में  नीर देख रही वो अपलक सी 
 बदलती ज़िन्दगी का रंग धूप छावँ सी 

कितने सवाल है उसकी खामोशी में 
ज्योंही पूछा हाल  हो  जाती  रुआसी सी 
किसी  ने तोड़ा दिल, किसी ने  तोड़ा विसवास 
बया करते- करते  क्यों हो जाती वो मूक सी

सागर की लहरो सा उठा है तूफ़ान मन में 
जैसे शांत जल में फ़ेक दी हो कंकड़  सी 
बनाया था जीवन मोतियों की माला सी 
देखा आज उन्हें एक़- एक कर टूटती सी 
                 

                  बबीता मिश्रा 
           विकासपूरी  न्यू दिल्ली-18