गांव है, शहर थोडी़ न है..!

By: Rahul Kiran

             

जगाती है यहां कोयलें, अपनी ही कूक से
शहर कर्कश थोडी़ न है ..!

गाँव की तंग  हैं गलियां, शहर- ए कॉलोनियां थोडी़ न  है!
आज़ाद हैं सब यहाँ के लोग , किराये का मकान थोड़ी न है।

रिश्तों में  हैं नज़ाकते यहाॅ ,शहरी चापलूस थोड़ी न हैं!
मकां कच्चे जरूर हैं यहाँ , मगर दिल -ए कमज़ोर थोड़ी न है!

तबस्सुम रहती हैं चेहरों पर,यहाँ हिज़्र थोड़ी न है।
तशरीह ना कीजिये ज़नाब, ये तुम्हारा शहर थोड़ी न  है।

सड़कों तक छोड़ने जाते हैं लोग, ओला , ऊबर थोड़ी न है।
ये मेरा गाँव है ज़नाब तुम्हारा शहर थोड़ी न है।

इश्क़-ए-मिज़ाज हैं अलग ,शहर के इश्क़ थोड़ी न है।
मोहब्बत सादगी है इनकी, इश्क़-ए-बवाल थोड़ी न है।

बार, रिजाॅर्ट नहीं हैं यहाँ, मग़र टपरिया कम थोड़ी न हैं।
चाय-ए-महफ़िल है सजती , ऐसा सुकूं शहर में  थोड़ी न  है!!

मकानों पर नम्बर नहीं हैं यहां ,नंबरों से ही पहचान थोड़ी न  है।
पिता के नाम से  है जानते यहां, ये सब शहरों में थोड़ी न है!

यहां नहीं हैं कोई द्वेश, न ही बैर कोई है
हैं सब मिल- जुल कर रहते, कोई
अनजान थोडी़ न है..!

रिश्ता दिल से निभाते हैं,
काम हो, तो ही बातें हो 
ऐसा स्वार्थ थोड़ी न है।

यूं ही नहीं भागते शहरी परींदे वहां से
वो जानते हैं उनका वो मकान थोडी़ न है..!

गाँव से हैं जरूर, मगर गंवार थोड़ी न हैं!
डिग्रियां नहीं हैं तुम्हारे इतनी,पर हुनर भी कम थोड़ी न है!
तबस्सुम- मधुर मुस्कान
टपरियां- झोपडी़                By- Rahul kiran
हिज्र - वियोग , विरह
तशरीह - व्याख्या