मैं मज़दूर

By: Manisha Rathour

"मैं मज़दूर"

मैं मज़दूर, घर से निकला था अपना आशियाना बनाने, उम्मीदो की एक पोटली साथ में ले, 
बड़ी बड़ी बिल्डिंगो की कुछ खिड़किया बनाने, दूसरो के आशिया को थोड़ा और रोशन बनाने, 
अनाजों के बोरो को भी पीठ पर ढोया हैं अपनी, की बच्चों के कंधो पर वो बस्ते चौकोर देख सकूँ कभी, 
मुझे दिन और रात एक से लगते हैं, अक्सर चूड़ियां  बनाते समय मेरे हाथ थोड़े जलते हैं, 
कच्ची सडको से रोज़ निकलता था उन्हें पक्की बनाने को, अपना आशियाँ छोडा था मैंने भी दूसरो का आशियाँ बनाने को, 


 भूख और ज़रूरते क्या हैं मुझसे पूछो, ज़िन्दगी से रोज़ लड़ना और उससे कहना थकने को नहीं निकला था मैं, उससे रोज़ रूबरू होना मुझसे पूछो, 
पितजी हर बार फ़ोन पर कहते हैं इस बार तो टुटी छत आकर ठीक करदो, ये पिछले साल से तुम्हारे इंतज़ार में दरारो से भरी खड़ी हैं, अब कैसे कहु पिताजी से......की पटरियों पर सिमटी हुयी कुछ रोटिया आज मेरे साथ पड़ी हैं, 
बसों के इंतज़ार में, तप्ता खडा हूँ फिर सुबह से शाम मैं, कुछ बोझा हाथ में लिए तो कुछ सर पर लिये, कुछ सवालो को साथ लिये, बदले में एक बार फिर जवावो के बहुत से खाली हाथ लिये, 
 मैं मज़दूर, घर से निकला था अपना आशियाँ बनाने..... 


मनीषा राठौर