ज़कात

By: Akshita Gupta

ज़बान पर रह जाती है एक और बात,

उसकी यादों में गुज़र जाती है हर रात।
 
खेल कुछ ऐसा है हाथ की लकीरों का,
ज़िन्दगी लिए घूमती है दर्द की ज़कात।
 
रब ने कभी नहीं है बांटा मोहब्बत को,
पर संसार तो बनाता है रब की भी जात।
 
किसी का प्रेम आज नहीं बनता मिसाल,
इतिहास की दास्तान भी खा जाती है मात।
 
दर्द तो छुपा सकते हो जहाँ से 'अक्स', 
लेकिन रब से कैसे छुपाओगे जज़्बात।