ज़ोरबा बुक्स की प्रकाशन टीम का भी धन्यवाद करना चाहूंगा जिन्होंने इतने कम समय में आश्चर्यजनक कार्यकुशलता के साथ
समूची किताब ख़्वाबों पे गुज़र कब होती है का वास्तविकता के धरातल पर सृजन किया। उनकी दक्षता का यह आलम रहा कि जब परंपरावश मुझे अपनी
ओर से प्रूफ़ रीडिंग का अवसर दिया गया तो ११० पृष्ठों की किताब में मुझे वर्तनी की कुल जमा तीन ग़लतियाँ मिलीं, जिनमे से
दो मेरी स्वयं की थीं, जो कि लिखते समय ही हो गयी थीं। इससे बेहतर प्रकाशन व्यवस्था और कुशलता की और क्या आशा कर
सकता है कोई भी लेखक! ज़ोरबा की संस्थापक सुश्री शालिनी, प्रकाशन विभाग की सुश्री तन्नू चौहान, श्री बिनोद भारती जी,
एडिटर्स, प्रूफ रीडर्स एवं ज़ोरबा की पूरी टीम को मेरी ओर से ह्रदय से आभार।