संतोष सिंह ‘ राख ‘ – Banker

प्रथमत: मैं विलम्ब से समीक्षा प्रेषित करने के लिए Zorba Publications से अविलंब क्षमा की याचना करता हूं।

    जिस प्रकार Zorba ने अपनी मुकम्मल तर्बियत की बारीकियों से मेरे कलम से निकली हर कलमों को,जो कभी डायरी के पन्नों में कैक्टस की तरह धंसी पड़ी थी, उसे ड्राइंग रूम के मोंगरे से लेकर सड़क और गलियों के गुलमोहर में तब्दील किया, मैं नि:शब्द हूं।

     मेरे शब्द बूंद जो दर दर भटकते बादलों की तरह थक कर, मेरे विचारों के कैनवस पे लगभग सिकुड़ने को थे, जोरबा प्रकाशन ने उसे नया आसमां दिया। एक नई उड़ान दी। पहचान दी।

   ” एक मुट्ठी राख ” और ” चाक चुम्बन ” मेरे दो अद्वितीय कल्प तरु हैं, जिनका प्रकाशन Zorba publications के अति विशिष्ट एवम महनीय हाथों ने किया है। अभूतपूर्व धैर्य, कदम-दर- कदम सहयोग, कुशाग्र मगर अनुरागपूर्ण अभिव्यक्ति से परिपूर्ण सम्पूर्ण मैनेजमैंट, प्रकाशन समूह और तकनीकी टीम की जितनी तारीफ की जाए कम है।

    नामचीन को चीन पहुंचाना बड़ा सरल है। परंतु अपने जबड़े से पत्थर को फोड़ उसे तराशकर हीरा बनाना बहुत मुश्किल। Zorba Publications, प्रकाशन जगत का वही नायाब जौहरी है। 

    हम जैसे लेखक एवम कवि, जिनके कॉन्टेंट में गुरुत्व होने के बावजूद साहित्य जगत में स्थापित (so called but not all) आका एवम अकादमियों के द्वारा उपेक्षित कर अंतिम पायदान पर शून्य में परिवर्तित होने को छोड़ दिया जाता है, इसे Zorba publications की अदम्त्य साहस और जज्बा ही कहेंगे जिसने जंगल के फूल को रसूल बनाना अपनी नैतिक जिम्मेदारी बना डाली है।

ईश्वर के हाथों मैं आशिर्वादीत हूं, जिनकी कृपावृष्टि से मुझे Zorba publications का सानिध्य एवम मार्गदर्शन मिला।