इंसान

ना सुख है ना चैन, 

बिना नींद के हो जाता है सवेरा, 

कोई चुरा ना ले भरी तिजोरी।   

नोटों से भरी मुट्ठी, 

सोच रह गई छोटी, 

दिखावटी शान।   

कोई बुरा करे तो हंगामा, 

मगर खुद की बुराई का क्या, 

आइना अब कोई रखता कहाँ।  

 

नहीं करते अनाज का सम्मान, 

मेहनत से जो उगाये किसान, 

वही भूखे पेट सो गया आज। 

  

क्या यही है इंसान, 

चंद रूपये, रोटी,  

कपड़ा और मकान।

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अदिति अन्विता