न जाने
न जाने कौन सी खता हुई है हमसे
कि यह वक्त की नाराजगी और सही नहीं जाती,
न जाने यह कैसा अंधेरों का साया है
कि खुद में और उनमें कुछ फर्क नज़र नहीं आता।
न जाने कौन सी खता हुई है हमसे
कि यह वक्त की नाराजगी और सही नहीं जाती,
न जाने यह कैसा अंधेरों का साया है
कि खुद में और उनमें कुछ फर्क नज़र नहीं आता।