न जाने

न जाने कौन सी खता हुई है हमसे 

कि यह वक्त की नाराजगी और सही नहीं जाती,

न जाने यह कैसा अंधेरों का साया है 

कि खुद में और उनमें कुछ फर्क नज़र नहीं आता।

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अदिति अन्विता