प्रताड़ना

उनके गेसुओं का गजरा-रुपी जीवन 

आज भी स्थिर है वही रस्मों रिवाजों की चांदनी में 

क्षीण होता सुगंध, रंग और आकर 

उन पुष्पों और उनकी रूह की आकांक्षाएं 

सीमित है खामोशियों में 

प्रताड़ित समाज की प्रताड़ना।

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अदिति अन्विता