पुरुष–स्त्री का ऊर्जा-सिद्धांत

भूमिका

यह अध्याय मानव संबंधों के उन अदृश्य सत्यों को खोलता है

जिन्हें हम आँखों से नहीं दे

पुरुष का स्त्री से भय,

स्त्री का अपना स्वभाव खो देना,

अमीर–गरीब का भ्रम,

छोटा–बड़ा होने का अहंकार,

और वह प्रेम जो इन सब सीमाओं को मिटा देता है।

भूमिका का उद्देश्य बस इतना है

कि पाठक आगे की पंक्तियाँ उसी दृष्टि से पढ़ सके

जिससे यह अध्याय लिखा गया है—

दृष्टि जो मन के भेदों को नहीं,

अस्तित्व की एकता को देखती है।

यह अध्याय बताता है कि

प्रकृति में छोटा–बड़ा कुछ नहीं,

सब परिवर्तनशील है;

और प्रेम वह शक्ति है

जो हीनता को गौरव में बदल देती है

और समानता की प्रतिस्पर्धा नहीं,

पूरकता की अनुभूति जगाती है।

✦ पुरुष–स्त्री का ऊर्जा-सिद्धांत: प्रतिस्पर्धा में स्त्री, स्त्री नहीं रहती

पुरुष हमेशा चाहता है कि स्त्री उसके साथ खड़ी हो —

पर स्त्री बनकर नहीं, पुरुष बनकर।

क्यों?

क्योंकि पुरुष को स्त्री-तत्व से डर लगता है।

स्त्री की करुणा, ममता, मौन, प्रतीक्षा, सहनशीलता —

ये सब पुरुष के अहंकार को चीर देते हैं।

इनसे सामना करना उसके लिए कठिन है।

इसलिए पुरुष चाहता है कि स्त्री प्रतिस्पर्धी बन जाए।

जब स्त्री प्रतिस्पर्धा में उतरती है,

तो वह स्त्री नहीं रहती —

वह भी पुरुष बन जाती है।

और पुरुष तुरंत आराम महसूस करता है:

“चलो, यह अब मेरी जैसी हो गई…

अब डरने की ज़रूरत नहीं।”

✦ स्त्री पुरुष बनती है — पुरुष जीत जाता है, और स्त्री अपना स्वभाव हार देती है

जैसे ही स्त्री पुरुष की भाषा, पुरुष का अहंकार, पुरुष का व्यवहार अपनाती है,

पुरुष की जीत वहीं तय हो जाती है।

स्त्री तो बस उसका नकली संस्करण बनती है।

और इस प्रक्रिया में

स्त्री का मूल स्वभाव—

स्त्री ऊर्जा, प्रेम, ममता, करुणा, सहनशीलता—

सब सूखने लगता है।

पुरुष कहता नहीं है, पर भीतर जानता है:

“मैंने स्त्री को पुरुष बना दिया —

अब वह मुझसे डरने लायक नहीं रही।”

✦ लेकिन सच्चा संतुलन तब मिलता है जब पुरुष स्त्री से सीखता है

स्त्री बनने में स्त्री को कोई संघर्ष नहीं।

वह प्रकृति है।

वह करुणा है।

वह प्रेम है।

लेकिन पुरुष…

पुरुष को सीखना पड़ता है—

• प्रेम

• धैर्य

• सहनशीलता

• प्रतीक्षा

• संवेदनशीलता

• ममता

यह सब स्त्री की सहज देन हैं,

लेकिन पुरुष के लिए तपस्या हैं।

जब पुरुष स्त्री-तत्व ग्रहण करता है,

तभी उसके भीतर असली मजबूती आती है।

तभी संतुलन जन्म लेता है।

तभी शिव और शक्ति का मिलन होता है।

तभी कृष्ण और राधा का रसायन जागता है।

✦ स्त्री गुरु है — चाहे अनपढ़ ही क्यों न हो

कितना गहरा सत्य है:

स्त्री को पुरुष बनने से कुछ नहीं मिलता।

पर पुरुष को स्त्री से सब कुछ मिलता है।

एक अनपढ़ स्त्री भी

पुरुष को दिशा देती है,

अहंकार तोड़ती है,

धैर्य सिखाती है,

प्रेम सिखाती है।

क्यों?

क्योंकि स्त्री के भीतर

माँ भी है, पत्नी भी, और गुरु भी।

✦ जब स्त्री प्रतिस्पर्धा में उतरती है — समाज मशीन बन जाता है

अगर स्त्री पुरुष जैसी बन जाए,

तो समाज में स्त्री-ऊर्जा का स्रोत सूख जाता है।

फिर बच्चे मशीनों जैसे होते हैं,

समाज मशीन जैसा होता है—

न करुणा, न गर्मी, न मातृत्व।

प्रतिस्पर्धा से

“समानता” तो मिलती है,

पर पूरकता खो जाती है।

जीवन 50/50 का खेल नहीं है।

जीवन 99/1 है—

एक नाजुक संतुलन,

जिसमें दोनों एक-दूसरे को पूरा करते हैं,

ना कि नकल।

✦ निष्कर्ष — स्त्री और पुरुष समान नहीं, परिपूरक हैं

जब दोनों एक जैसे बन जाते हैं,

तो अस्तित्व हार जाता है।

जब दोनों अपने स्वभाव में रहते हैं,

तो जीवन खिलता है—

जैसे दो अलग सुर

मिलकर संगीत बना देते हैं।

✦ छोटा–बड़ा का खेल — प्रेम में सब बराबर हो जाते हैं

जब एक वृद्ध बच्चे को प्रेम करता है,

तो बच्चा अचानक बड़ा महसूस करता है।

उसे लगता है —

“मैं छोटा नहीं हूँ।

कोई मुझे समान देख रहा है।”

जब अमीर गरीब के प्रति प्रेम रखता है,

तो गरीब को भी लगता है —

“मैं भी कुछ हूँ, मैं भी अमीर हूँ।”*

क्यों?

क्योंकि प्रेम छोटा–बड़ा नहीं देखता।

प्रेम बराबरी नहीं बनाता —

प्रेम ‘स्वाभिमान’ जगाता है।

✦ अदृश्य जगत में अमीर–गरीब उलटे होते हैं

वास्तविकता में

अमीर जरूरी नहीं कि अमीर हो,

और गरीब जरूरी नहीं कि गरीब।

क्योंकि अदृश्य जगत में —

• गरीब प्रेम में धनी हो सकता है,

• और अमीर प्रेम में गरीब।

एक के पास पैसा है

दूसरे के पास हृदय।

दुनिया सिर्फ वही देखती है

जो दिखाई देता है,

पर अस्तित्व मूल्य देता है

जो अनदेखा है।

✦ प्रकृति में कोई छोटा–बड़ा नहीं होता

प्रकृति न किसी को बड़ा बनाती है,

न छोटा।

आज जो बीज है

कल वृक्ष है।

आज जो राजा है

कल राख है।

प्रकृति कहती है:

“परिवर्तन ही सत्य है।”

इसलिए छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, ऊँचा-नीचा —

सब मन के खेल हैं।

सब अहंकार की परतें हैं।

✦ और यही नियम स्त्री–पुरुष पर भी लागू होता है

यदि स्त्री और पुरुष

एक-दूसरे की बराबरी बनकर खड़े हो जाएँ —

यानी दोनों “पुरुष” बन जाएँ —

तो प्रेम का जन्म असंभव है।

बराबरी में सिर्फ

प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है।

और प्रतिस्पर्धा में प्रेम नहीं पनपता।

प्रेम तभी खिलता है

जब एक अपनी सम्पूर्णता में खड़ा हो

और दूसरा अपनी सम्पूर्णता में।

✦ सच्चा धर्म — जब बुद्धिमान पागल से प्रेम करता है

जब बुद्धिमान पागल से प्रेम करता है,

तो यह बुद्धिमानी नहीं…

ईश्वर का स्वभाव है।

क्योंकि अस्तित्व का नियम है:

ऊँचा नीचे को उठाता है,

पूर्ण अपूर्ण को भरता है।

यह अहंकार का खेल नहीं —

यह प्रेम का धर्म है।

यही अध्यात्म है।

यही अस्तित्व का सबसे सुंदर रूप है।

✦ निष्कर्ष

प्रेम छोटा-बड़ा मिटा देता है।

प्रेम में कोई बराबर नहीं होता —

क्योंकि प्रेम बराबरी नहीं चाहता,

पूरकता चाहता है।

छोटा-बड़ा मन की बीमारी है।

प्रेम, करुणा, संतुलन —

ये प्रकृति का धर्म हैं।

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✦ स्त्री को सफ़ेद वस्त्र की ज़रूरत नहीं — स्त्री स्वयं त्याग है

स्त्री को त्याग सीखना नहीं पड़ता।

स्त्री त्याग जीती है।

वह कोई चीज़ पकड़े ही नहीं रहती —

न सत्ता,

न अधिकार,

न मालिकी का अहंकार।

पुरुष पकड़ता है —

इसलिए उसे छोड़ना सीखना पड़ता है।

पुरुष में अहंकार दिखता है,

स्त्री में अक्सर दूसरी स्त्री के प्रति ईर्ष्या —

पर यह भी उसी समाज की देन है

जहाँ स्त्री का स्वभाव दबाया गया है

और पुरुष के गुण थोपे गए हैं।

✦ स्त्री का धर्म कोई नियम या योजना नहीं

स्त्री हवा जैसी है —

बहती है…

पानी जैसी है —

जहाँ जगह मिले वहाँ जीवन पैदा कर दे।

स्त्री का स्वभाव अनिश्चितजीवनदायीकरुणामयी है।

और इसी अनिश्चितता में उसकी शक्ति है।

और आज स्त्री क्या खो रही है?

अपना स्त्रीत्व।

अपनी कोमलता।

अपना असली धर्म —

घर, परिवार, समाज की नींव को पकड़े रखना।

 स्त्री का संन्यास — शास्त्रों में नहीं मिलता

क्यों?

क्योंकि स्त्री का धर्म समाज से भागकर जंगल में नहीं होता।

स्त्री का धर्म दुनिया के बीच खिलता है —

रिश्तों में, बच्चों में, घर में, समाज में।

सेवा अगर करनी है

तो किसी संस्था में जाने की क्या ज़रूरत है?

जिस समाज में खड़ी हो,

वहीं हजारों ज़रूरतें पड़ी हैं।

यदि घर में, पड़ोस में, समाज में प्रेम नहीं कर पा रही,

तो संस्था में जाकर कौन सा दिव्य प्रेम मिल जाएगा?

वहां साधना कम,

राजनीति ज़्यादा होती है।

पुरुष ज्ञान में गिरता है,

स्त्री सेवा में।

पर सेवा भी यदि “किसी संस्था की सदस्यता” बन जाए,

तो वह सेवा नहीं —

अहंकार का नया रूप बन जाती है।

✦ स्त्री का असली कर्म — समाज की नींव को मजबूत बनाना

यदि स्त्री चाहे,

तो वह दूसरी स्त्री को उठा सकती है,

बच्चों को संस्कार दे सकती है,

समाज को बदल सकती है —

बिना कहीं गए,

बिना कोई पद पाए।

क्रांति घर में शुरू होती है,

संस्था में नहीं।

जो संसार हिंसा, झूठ और छल से भरा हो,

वहां से भागकर आश्रम में जाना

आत्मा का विकास नहीं —

वास्तविक जीवन से भागना है।

✦ धर्म संस्था नहीं — स्वभाव है

जो तुम्हें तुम्हारा स्वभाव जीने दे वही धर्म है।

जहाँ नियम, बंधन, नियंत्रण, पद, राजनीति शुरू —

वह धर्म नहीं,

गुलामी है।

स्त्री का धर्म किसी वेश, व्रत, पद, संन्यास में नहीं —

उसकी सत्यता,

उसकी करुणा,

उसकी जीवन धारण करने की क्षमता में है।

✦ निष्कर्ष — स्त्री का घर ही स्त्री का धर्म है

समाज की सबसे पवित्र नींव स्त्री के हाथ में है।

समाज से पलायन कर संस्था में जाना

क्रांति नहीं, भ्रम है।

जीवन को समझकर जीना है

तो किसी संस्था की ज़रूरत नहीं —

स्वभाव ही सबसे बड़ा धर्म है।

 अंतिम सारांश 

अंत में यह स्पष्ट हो जाता है कि

मनुष्य के सारे भेद—

अमीर–गरीब, छोटा–बड़ा, बुद्धिमान–मूर्ख, स्त्री–पुरुष—

सब अहंकार के खेल हैं,

प्रकृति के नहीं।

प्रकृति किसी को ऊँचा नहीं करती,

न नीचा;

वह सिर्फ बदलती है—

बीज को वृक्ष,

राजा को राख,

और भय को प्रेम में।

पुरुष–स्त्री का सत्य भी यही है—

समान होकर नहीं,

पूरक होकर प्रेम जन्म लेता है।

स्त्री पुरुष की प्रतिद्वंद्वी नहीं,

उसकी सीख है;

और पुरुष तभी परिपक्व होता है

जब वह स्त्री-ऊर्जा को समझ पाता है।

अंततः अध्याय यही कहता है—

अहंकार विभाजित करता है,

प्रेम जोड़ देता है।

जो इस सत्य को समझ लेता है,

वही जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से

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