स्त्री–पुरुष, संघर्ष–समर्पण : एक विज्ञान
स्त्री–पुरुष, संघर्ष–समर्पण : एक विज्ञान ✧
वेदान्त २.० — मन के युग में सत्य — 🙏🌸 अज्ञात अज्ञानी
1️⃣ स्त्री के लिए फल नहीं—कृत्य ही आनंद है
स्त्री का धर्म प्राप्ति नहीं, स्थिति है।
जो वह करती है—
उसी क्षण में पूर्ण होती है।
उसका आनंद भविष्य में नहीं, वर्तमान में है।
फल की प्रतीक्षा नहीं—
इसलिए अहंकार भी नहीं।
2️⃣ पुरुष का जन्म संघर्ष से होता है
पुरुष का पथ—
चढ़ाई है, आक्रमण है, लक्ष्य है।
संघर्ष से ऊर्जा पैदा होती है।
लेकिन
जब वह फल को सफलता समझ लेता है—
वहीं अहंकार जन्म लेता है।
और वही माया है।
3️⃣ संघर्ष → ऊर्जा → समर्पण = रूपांतरण
संघर्ष बुरा नहीं है।
संघर्ष ऊर्जा पैदा करता है।
लेकिन ऊर्जा का अंतिम चरण समर्पण है।
समर्पण में—
ऊर्जा → प्रेम बनती है
काम → करुणा बनता है
क्रोध → शक्ति बनता है
मोह → आनंद बनता है
यहीं ‘मैं’ का संहार होता है।
4️⃣ पुरुष जब समर्पण सीखता है—वह स्त्रीत्व को छूता है
जिस दिन पुरुष फल छोड़कर कृत्य में उतरता है,
उसी दिन उसे स्त्री जैसा आनंद मिलता है।
फल में—
अहंकार है।
कृत्य में—
आनंद है।
5️⃣ स्त्री के लिए न धर्म चाहिए, न गुरु
स्त्री के लिए—
कर्मकांड नहीं
संघर्ष नहीं
उपदेश नहीं
उसका धर्म केवल एक है:
👉 कृत्य के साथ समर्पण बनाए रखना।
वह सीखती नहीं—
हो जाती है।
इसलिए
स्त्री को गुरु की ज़रूरत नहीं।
वह स्वयं ज्ञान-स्थिति है।
6️⃣ पुरुष जब समर्पण भूलता है—रावण बनता है
संघर्ष + अहंकार = रावण।
यही कारण है कि—
गुरु का अहंकार
सेवा का अहंकार
भक्ति का अहंकार
धर्म का अहंकार
एक ही बिंदु से निकलते हैं:
👉 करता-भाव।
7️⃣ धर्म, पंथ, संस्था—अहंकार के संगठन हैं
जब ‘मैं कर रहा हूँ’ बना रहता है—
तब—
गुरु बनते हैं
संस्थाएँ बनती हैं
शाप–आशीर्वाद बिकते हैं
डर पैदा किया जाता है—
“आज्ञा नहीं मानी तो श्राप लगेगा।”
डर से झुकी दुनिया
अस्तित्व के विज्ञान को नहीं समझ पाती।
8️⃣ कृपा कोई नहीं करता—यह विज्ञान है
कोई कृपा नहीं बरसती।
कोई आशीर्वाद नहीं देता।
जब तुम—
संघर्ष को समझते हो
अहंकार छोड़ते हो
अस्तित्व के प्रति समर्पित होते हो
👉 परिणाम अपने आप घटता है।
यह रहस्य नहीं—
यह विज्ञान है।
9️⃣ गुरु भी इसी माया में फँसा है
अधिकांश गुरु भी—
भीड़ में उलझे
सेवा के अहंकार में
कृपा बाँटने के नाटक में
वे भी अज्ञानी हैं—
बस उनकी अज्ञानता सूक्ष्म है।
🔟 अंतिम सूत्र
जीवन रहस्य नहीं—विज्ञान है।
0 से चला—
और 0 में ही लौटता है।
धर्म, धारणा, मान्यता—
सब जड़ अहंकार की परतें हैं।
जो अस्तित्व का सूत्र समझ ले—
👉 उसे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं।
✧ गुरु बाहर नहीं—भीतर घटता है ✧
शास्त्र कहते हैं “गुरु अनिवार्य है”
तो उसी शास्त्र में यह भी है—
ज्ञान अनिवार्य है।
जो भीतर समझ दे—
वही गुरु है।
गुरु के चार हाथ नहीं होते।
चार आँखें नहीं होतीं।
👉 गुरु = समझ।