स्कूल लिविंग (कविता )
स्कूल लिविंग
गर्मी की छुट्टी में,
स्कूललिविंग लेने
जब
अपने हॉयर सेकंडरी स्कूल में
दाखिल हुआ,तो
ख्याल ही न आया,
मेरा बचपन,तेरा बचपन
खेलने में जहाँ
सारा बचपन गुजर गया
वो स्कूल, मेरे लिए
कितना पराया हो गया ।
कुछ रह गया था
पीछे छूट गया था,
सूने सूने बरामदें
लंबे लग रहे थे,
और वीरान
कभी साफ़ सुथरें रहे
स्कूल से
नदारद थे,
वो कागज़ के टुकड़े,
वो बस्तों के रेले ।
खाली खाली कक्षाएँ,
रीते रीते बेंच,
मेरी अपनी कक्षा में
धुंधला गया था।
मेरे बैठने की जगह
दीवार पर,
परकार की तीखी नोक से
खरोंचा हुआ,
“एक “नाम |
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कैसा किशोर मन था,
उलझ जाता था,युँ ही
किसी टीचर मेम की
लहराती चोटी में,
चलती कक्षा में,
आखरी बेंच पर बैठे,
चितराये थे,
रफ कॉपी के
कितने आखरी पन्ने |
बचपन के,
अनकहे जज्बातों के
वो दर्जनों दस्तावेज,
कोड़ियो के दाम,
रद्दी में बिक गए थे |
स्कूल के अहातें में खड़े,
मोरसली के पेड़ तले,
सूखे पत्तों के ढेर में,
दफ़न हुई थी
यादों की ढेरों सरगमें ।
वो संगी,वो साथी,
वो बाल सभा,
किसी छुटभैय्ये के मरने पर
वो छुट्टी,वो शोक सभा |
वो वॉलीबाल की गेंद पर
फुटबॉल की किक,,
और गर्मी की दोपहर में
वो कोयल की कूक।
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याद ही नहीं रहा,
परीक्षा को छोड़,
कभी पढाई की थी ,
अपने नाम पुकारने पर,
हर दिन,यस सर
किसी ओर ने की थी |
और आज !
खुद हाजिर होकर,
हाजरी से नाम कटवाने की,
बैचैनी थी ।
चाहकर भी अब,
कुछ मेरा न रहा,
जो यहाँ छूट गया था
वो आगे मिलने से रहा |
गर्म हवा का,
एक झोका आया,
और झझकोर गया |
भीतर कुछ हो रहा था,
अब,डर लगने लगा था,,
कुछ ही पल में
प्रिंसिपल सर से,
स्कूल लिविंग लेते…..
कहीं रो न पडू मैं..
(समाप्त)
By : Ajay