जब भी जाती हूँ घर अपने
जब भी जाती हूं घर अपने
ढूंढती हूं अपनी यादों का वो कोना
छोड़ आयी थी जिसे मैं याद नहीं कहां
ढूंढने पर भी नहीं मिलता अब वहां
मम्मी पापा, भाई , सहेली
जिनके साथ थी मैं खेली
शक्ल वही पर लोग अलग हैं
क्यों सपनों और सच में इतना फर्क है
क्यों नहीं लगता अब वह घर मेरा
लगता नहीं कभी वहां था मेरा बसेरा
क्यों सब बदल जाता है
टूटता हर नाता है
कभी मिल जाए मा तो भेज देना सभी
मेरी यादें भूली बिसरी।