अभिनय से अनुभव तक

जो हाथ डगमगाते कदमो को चलना सिखाते थे 
आज अपने क़दमों को ही नहीं सम्भाल पाते है 
बार बार लड़खड़ाते हैं 
 

जो बचपन में साथ बैठकर पाठ याद करवाते थे 
अब डेमेंटिया जैसे दानवो के वशीभूत 
अपने बच्चो को अजनबी निगाहों से देख हैं

वो सदा हमारे मंगल कामना के लिए उठे आशीष स्वरुप हाथ 
आज पार्किंसन मानो उन हाथो को पकड़ कर झकझोर रहा हो 

 

संभवतः निर्देशक ईश्वर का ऊपर से आदेश है 
अनुभव संपन्न इनको अब सहज बाल चरित्र में आने दो 
गोधूलि की इस बेला में उन्हें भी उन्मुक्त सुबह का आनंद उठाने दो |

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Anita sharms