न मंदिर की न मदीने की, ये जंग है हमारे जीने की
न मंदिर की न मदीने की, ये जंग है हमारे जीने की
महीना पूरा होते ही न मिलने वाले उजरत की, और बेरज़गारी की वजह से खो जाने वाले उल्फत की
वह सर्द गर्म मौसम में होने वाले मर्ज़ की, और न चुका पाने वाले क़र्ज़ की।
यह जंग है मरते खिरमान की, यह जंग है हमारे ही चुने नेताओं के ईमान की,
बिखरे टूटे सपनों की, घुट घुट के मरते अपनों की!
ये जंग नहीं है आपस में, न ये जंग असल में कागज़ पे,
ये जंग हैं मुल्क के वजूद की, ये जंग है सियासती मक़सूद की