वो आंखें

जब भी उठती हैं वो पलकें, वक़्त थम सा जाता है,

मेरे दिल का हर एक कोना, जैसे रम सा जाता है।

न जाने कौन सी कशिश है उन गहरी निगाहों में,

जो देखे एक दफा, वो बस वहीं जम सा जाता है।

समंदर से भी गहरी हैं, झील सी शांत लगती हैं,

कभी चंचल सी लहरें, कभी एकांत लगती हैं।

मैं ढूँढता हूँ खुद को जब उनकी काली पुतलियों में,

वो मुझे मेरी ही रूह का, कोई प्रांत लगती हैं।

वो काजल की लकीरें, जैसे सरहद हों चाहत की,

उनमें मिलती है मुझको, हर एक सांस राहत की।

बिना बोले ही कर देती हैं वो इज़हार-ए-मोहब्बत,

अदाएं सीख ली हैं उन्होंने, बड़ी नज़ाकत की।

न मैखाने की ज़रूरत है, न साकी का सहारा है,

उन आँखों के नशे में तो, ये दिल आवारा है।

हज़ारों मयकदे कुर्बान हैं उनकी एक झलक पर,

मुझे तो डूब जाने को, बस उनका ही किनारा है।

मैं कैद हूँ उम्र भर को, अब रिहाई नहीं मांगता,

उन आँखों के सिवा मैं, कोई खुदाई नहीं मांगता।

बस एक गुज़ारिश है तकदीर से मेरी अब यही,

मैं उन आँखों से कभी, कोई जुदाई नहीं मांगता।

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Arjun Bharti Mina