जरा अब यो सोचे
कहा थे कहा आ गए अब,
जरा अब तो सोचे।
पृकृति के संदेश को,
जरा ठहरे ,जरा सोचे।
किस भटकाव में हम खो गए,
जरा रुके और देखे।
मानवता की पीड़ा को,
अब हारने की सोचे
आये थे धरा संवारने,
दोहन की बात न सोचें
जो कमाया जो भी पाया
धारा पे रह जाना है
कुछ अब यू कमाए,
जो संग ले जाने की सोचे
मानवीय मूल्यों,भाव संवेदना,सद्गुणों को सीखे,
नियंत्रित मन से प्रेम भाव की संचित खुशिया सारी हो
यही जन जन की कहानी हो
यही जन जन की वाणी हो