School ki yaadein, naadaniya
स्कूल के साथ सुबहें भागती-सी होती हैं,
आधे बंधे जूते, नींद भरी आँखें होती हैं।
भारी-भारी किताबें, थका-सा मन,
हर कदम पर बस आराम का ही सपना।
शिक्षकों की आवाज़, बोर्ड पर चलती चॉक,
कुछ बातें समझ आएँ, कुछ लगें अनजान-सी।
परीक्षा का दबाव, नंबरों की दौड़,
समय के साथ चलता एक अनकहा शोर।
पर इन्हीं में छुपी होती हैं हँसी की बातें,
दोस्त जो बना देते हैं दिन को खास।
साझा टिफिन, राज़ और छोटी-छोटी लड़ाइयाँ,
साधारण पलों को बना दें यादगार कहानीयाँ।
स्कूल के बिना सुबहें धीमी हो जाती हैं,
न घंटी का डर, न कहीं जाने की जल्दी रहती है।
आज़ादी मीठी लगती है, खुला-सा जहाँ,
न कोई रोक-टोक, न छुपाना कुछ वहाँ।
लेकिन फिर याद आती है वो भीड़-भरी राहें,
गलियारों में गूँजती कदमों की आहटें।
वो दोस्त जो हर दिन सीट बचा लेता था,
वो छोटे-छोटे पल जो चुपके से चला जाता था।
मुझे याद आता है वो शोर, वो हलचल, वो बात,
मासूम हँसी, बचपन के वो जज़्बात।
क्योंकि स्कूल के बिना ज़िंदगी शांत तो है,
पर जैसे कुछ अपना-सा कहीं खो गया है।
शायद स्कूल सिर्फ एक जगह नहीं,
बल्कि यादें हैं, जो कभी मिटती नहीं।
इसके साथ ज़िंदगी तेज़ और रंगीन लगती है,
और इसके बिना…
थोड़ी खूबसूरत, पर थोड़ी अधूरी-सी लगती है।