आगाज़

आसमान में छाए आज,

ये स्याह, गहरे, बोझिल बादल… क्यों?

क्या तुम्हें भी,

किन्हीं अदृश्य तूफानों के पाँव की आहट का

आभास हुआ है?

या फिर…

ज़मीर को झकझोरने का

एक और तीखा आग़ाज़ हुआ है!

जहाँ चप्पे – चप्पे पर,

सहमकर सिसकता मासूमियत का हर कतरा रोता है,

और इंसान…

मज़हब और नफ़रत के बीच,

अपने ही दिल में बारूद और बंदूकें बोता है।

क्या बेबस दम तोड़ती इंसानियत का,

तुम्हें भी कोई सर्द आभास हुआ है?

या फिर…

सोए हुए समाज को जगाने का

शायद…

फिर से कोई नया आग़ाज़ हुआ है?

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Ayesha Yadav