दादी माँ

आज मैं अपनी दादी माँ को दखेती हूँ ,तो मुझे उनमें अपना बचपन दिखाई देता हैं ..

वही  बच्चों की तरह ,छोटी सी बात को दिल पर लगा लेना
  वहीं छोटी सी चीज के लिए जिद पर अर जाना,
वहीं बच्चों की तरह सुई लगने पर रोना, और छोटा सा जख्म तक हो जाने पर ,घर को सिर पर उठा लेना..

   और आज उन्हें देख कर बहुत आश्चर्य होता है, कि
   जिस दादी माँ ने मुझे पाला था..
 आज खुद वह एक बच्चे की तरह बन सी गयी हैं ।

Comments are closed.

Chandni kaur