न्याय की भूख

पैसे से,नाम से, करते लोग जुर्म और रहते आराम से,

ऐसे कितने हैं केसेस जिन्हें करते हैं क्लोज,

क्योंकि इन्वेस्टिगेशन के नाम पर नहीं मिलते सबूत,

जिन पर जिम्मेदारी है वहीं मचाते हैं लूट,

*न्यायालय में नहीं बची अब न्याय की भूख,

तारीखों पर पड़ती तारीखें हर बार,

"बिक गया सारा यह संसार"!

 

फर्क बस यहीं पे आता है,

क्यों गरीब का खून भी पानी,

और अमीर का कागज लकीर बन जाता है,

क्यों रूल्स एक जैसे सबके लिए नहीं,

मंत्री को दर्शन पहले आम आदमी के लंबी लाइन है बनी,

भगवान भी क्या भक्त चुनने लगा है?

नहीं; सही गलत का भेद अब खुलने लगा है

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