प्रेम बावरी

उस ओर खड़े तुम दरिया के, इस ओर मैं आहें भरती हूँ
है हृदय ध्वनि सी हालत मेरी, कभी रुकती मैं कभी चलती हूँ
तुझे रिझाने को प्रियतम मेरे, शत रूप हर क्षण बदलती हूँ
हूँ मीरा सी मैं प्रेम बावरी, देखा बस तुझको करती हूँ

बिंदिया भाल पे सजा के यूँ, सोलह श्रृंगार संवरती हूँ
इक हवा सी तेरे इर्द गिर्द मैं, कभी ठहरुं कभी गुजरती हूँ
सुबह के जैसे तू खिलता है, मैं इक शाम के जैसे ढलती हूँ
हूँ मीरा सी मैं प्रेम बावरी, देखा बस तुझको करती हूँ

 

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Deepak Dwivedi