तुम कहाँ जा रहे हो
कुछ धुधंला हुआ है रास्ता, क्या अंधेरा छट रहा है?
फिर तीखी यादों की रोशनी को समेटने तुम कहाँ जा रहे हो
वीराने खंडहर में संजोया है खुद की ममता को
शोर की तन्हाइयों में गुम तुम कहाँ जा रहे हो
दिल दुखा जब, दर्द रहा तब, घाव भरे नहीं है अभी
फिर कोई हमसफ़र तलाशने तुम कहाँ जा रहे हो
आंचल में लगाए लांछन को महकता छोड़
बिखरे अस्तित्व को दफनाने तुम कहाँ जा रहे हो
उल्फत, हसरत, इबादत और नफरत की दुआ है मुस़ाफिर
जड़ों को अपनी बिसार के सुरा(मदिरा) में समाने तुम कहाँ जा रहे हो।