मैं आजाद हूं
मैं ज़िंदा हूं तो बेशक आजाद हूं
पर मुझे जीने के लिए सांस कितनी चाहिए
ये मुझे घूंघट में बांधकर
ज़माने के ठेकेदार बताएंगे
पर मेरी सांसों का महकना नहीं बांध सकते
क्योंकि ये मेरी सांसें हैं
चूड़ी से पाजेब-बिछिया तक
वो मुझे बेड़ियों में जकड़ाना चाहते हैं
पर नहीं जकड़ सकते क्योंकि
उन्होंने हथियार चलाने और मैंने
उन्हें श्रृंगार कर दिया
क्योंकि मैं आजाद हूं
वो मुझे व्रतों के नाम पर
पौरुष की दासी बनाने पर तुले हैं
पर सब व्यर्थ है क्योंकि
मैं आजाद हूं- "विचारों से" इसलिए
हर गुलामी में आजादी का जरिया ढूंढ लेती हूं