ताल: एक अधूरा एहसास
हमारा इश्क़ मुकम्मल था, बस ज़माना ही अधूरा रहा, हालातों की जंग में, मैं अपने ही साये से लड़ता रहा।
तुझे पाने की खातिर, तुझे ही छोड़ दिया मैंने, दुनिया की नज़रों में ‘क़ाबिल’ बनने के लिए, अपना घर तोड़ दिया मैंने।
शहर बदले, चेहरे बदले, और ख़ुद को भी बदल डाला, मगर इस नादान दिल का मैं क्या करता?
ये तो आज भी वहीं धड़कता है, जहाँ तुझे छोड़ा था।
अब समझ आया कि मंज़िलें तो सिर्फ़ दिखावा थीं, असली सफ़र तो तेरी उन गलियों में था।
मेरे हर ज़िक्र, मेरी हर ख़ामोशी का जो सार है, तू महज़ एक याद नहीं, तू ही मेरे जीने की ‘ताल’ है।