अंतिम प्रश्न: एक JRF स्कॉलर की गवाही

मैं भारत का एक JRF स्कॉलर हूँ—

Physics मेरी पहचान थी,

और कभी मुझे यकीन था

कि मेहनत ही मेरा रास्ता बनाएगी।

जब मैंने JRF निकाला था,

तो घर में खुशी थी,

लोगों की आँखों में इज्जत थी,

और मुझे लगा था—

अब सफर मुश्किल नहीं, बस ईमानदार होगा।

मैंने रिसर्च पेपर पब्लिश किया,

रातों को जलाकर थ्योरी समझी,

इक्वेशन्स को सिर्फ लिखा नहीं—

उन्हें जिया था मैंने।

पर 3 साल बाद…

सच ने अपना असली चेहरा दिखाया।

मैं इंटरव्यू देने गया—

तीन अलग-अलग कॉलेजों में,

हाथ में क्वालिफिकेशन,

दिमाग में नॉलेज,

और दिल में उम्मीद लेकर।

पर वहाँ एक और ही खेल चल रहा था—

जिसका हिस्सा मैं कभी था ही नहीं।

मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ।

और जिस लड़के का हुआ—

उसने सिर्फ SET निकाला था,

ना JRF, ना वो गहराई,

जो मैंने अपनी ज़िंदगी से चुकाई थी।

तब समझ आया—

ये खेल क्वालिफिकेशन का नहीं है,

ये खेल कनेक्शन और पैसे का है।

NET, JRF, SET—

जो कभी इज्जत के प्रतीक थे,

आज बस डिग्री बन चुके हैं—

फाइलों में दबे हुए कागज़,

जिनकी कीमत इंटरव्यू के बाहर ही खत्म हो जाती है।

मुझसे नहीं पूछा गया—

मैंने क्या सीखा, क्या किया,

मुझसे पूछा गया—

“तुम्हारे पास क्या है… जो दिखाया जा सके?”

और धीरे से सुना—

गेस्ट लेक्चरर की एक कुर्सी के लिए

10 लाख तक की बात हो रही थी।

उस पल…

मेरे अंदर कुछ टूट गया।

मैं साइंटिस्ट बनकर गया था,

पर सिस्टम ने मुझे एक गवाह बना दिया—

उस सच का, जिसे सब जानते हैं,

पर कोई बोलता नहीं।

मैंने रिलेटिविटी पढ़ी थी—

पर सिस्टम ने मुझे एक और रिलेटिविटी सिखा दी:

यहाँ सच का कोई स्थिर रूप नहीं होता,

सब कुछ पैसा और पावर के हिसाब से बदलता है।

यह वही देश है—

जहाँ कभी सोच पैदा होती थी,

जहाँ ज्ञान तपस्या था,

और रिसर्च एक पूजा।

आज…

यहाँ रिसर्च बिक रही है,

सुपरवाइज़र गाइड नहीं—

रेट कार्ड बन चुके हैं।

और मैं…

सिर्फ अपनी आत्मा लेकर खड़ा था—

जो बिकने से इनकार करती रही।

गलती मेरी नहीं थी—

पर हार मेरी हो गई,

क्योंकि मैंने अपनी सच्चाई

किसी सौदे के सामने झुकने नहीं दी।

फिर एक दिन…

मैंने खुद से एक सवाल पूछा—

“क्या मैं इस जाल का हिस्सा बनूँगा?

या इससे बाहर निकल जाऊँगा?”

और आज…

मैं अपना उत्तर लिख रहा हूँ—

अब वो समय नहीं रहा

जब NET, JRF, SET से इज्जत मिलती थी,

जब इन नामों से नौकरी का दरवाज़ा खुलता था।

आज के समय में—

ये सब बस डिग्री बन चुके हैं,

और सिस्टम एक बाज़ार।

पर मैं…

इस बाज़ार का हिस्सा नहीं बनूँगा।

मैं इस जाल से खुद को मुक्त करता हूँ।

ना मैं अपनी पहचान बेचूँगा,

ना अपनी मेहनत की कीमत लगने दूँगा,

ना मैं उस दौड़ में भागूँगा

जहाँ जीतने के लिए खुद को खोना पड़ता है।

अब मेरी पहचान कोई डिग्री नहीं,

ना NET, ना JRF, ना SET—

अब मेरी पहचान मेरा सच है।

शायद दुनिया कहे—

मैं हार गया,

पर मैं जानता हूँ—

मैं पहली बार आज़ाद हुआ हूँ।

क्योंकि असली जीत सिस्टम में घुसना नहीं होती,

असली जीत होती है—

उस सिस्टम से ऊपर उठ जाना।

और आज…

मैं वही कर चुका हूँ।

Leave a Reply

Harsh Pandey
Chhattisgarh